Actor dilip kumar : दिलीप कुमार की याद


द्वारिका प्रसाद अग्रवाल

Actor dilip kumar अभिनेता दिलीप कुमार सच में अद्भुत कलाकार थे. उन्होंने अनेक फिल्मों में अभिनय किया, कुछ-एक फिल्म में गाने भी गाये लेकिन केवल एक फिल्म बनाई, सिटीजन्स फिल्म के बैनर तले, ‘गंगा जमना’, जो अपने जमाने की अत्यंत हिट फिल्म थी और प्रभावोत्पादक भी.
जब कोई कलाकार अपनी अभिनय प्रतिभा से दर्शक के दिल में स्थायी जगह बना ले तो वह यादगार कहानी बन जाती है. दिलीप कुमार और वैजयंतीमाला को बी.आर.चोपड़ा की फिल्म ‘नया दौर’ में देखा था लेकिन यह जोड़ी फिल्म ‘गंगा जमना’ में गज़ब कर गयी. भोले-भाले ग्रामीण गंगा की भूमिका में दिलीपकुमार और उसकी प्रेमिका धन्नो धोबन के रूप में वैजयंतीमाला को भुला पाना असंभव है. गाँव में होने वाली हंसी-ठिठोली से लेकर प्रेम के उच्चतम शिखर तक ले जाने वाली इस रोमांचक कथा को स्वयं दिलीपकुमार ने रचा था.
गरीब और अमीरी का जीवन, गरीबी का निबाह और अमीरी का आतंक, कर्तव्य और अपराध के द्वंद्व को फिल्म ‘गंगा जमना’ में ईस्टमेनकलर में फिल्माया गया था. इसके फिल्मांकन के लिए गाढ़े रंगों को चुना गया जिसने अत्याचार और उसके विरुद्ध संघर्ष को अधिक असरदार बना दिया.
एक समय था जब मध्यप्रदेश के चम्बल का इलाका डाकुओं के आतंक से त्रस्त था. इनमें डाकू मानसिंह, तहसीलदार सिंह, सूबेदार सिंह, लुक्का, पन्ना बाई, तुलसी बाई, पानसिंह तोमर, पंचम सिंह, मोहर-माधो, माखन-चिड्डा, बाबा-मुस्तकिल, फूलन-विक्रम, श्रीराम-लालाराम, ददुआ आदि डाकुओं ने मध्यप्रदेश और उत्तरप्रदेश को डकैती के आगोश में समेट लिया था. उनको समाप्त करने की पुलिस की कोशिशें निष्फल हो जाती थी क्योंकि वहां के स्थानीय नागरिक डाकुओं का साथ देते थे. यदि कोई गिरफ्तार हो जाता तो उसे जेल में बंद करके रखना भी मुश्किल था. आचार्य बिनोबा भावे की पहल पर 19 मई, 1960 को डाकू-गिरोहों के 11 मुखियाओं ने लुक्का के नेतृत्व में विनोबा के चरणों में अपने हथियार रख दिए. इन डाकुओं ने आत्मसमर्पण किया और सामान्य नागरिकों की तरह जीवनयापन का वादा किया. लुक्का ने अश्रुपूरित आंखों से कहा था- ‘अब तक हमने बहुत से बुरे काम किए हैं. उन पर हमें दुःख हो रहा है.’ उनके लिए देश में पहली बार खुली जेल बनायी गयी, उन पर भरोसा किया गया जिसे उन डाकुओं ने निभाया.
जब यह घटना चर्चा में थी तब इस फिल्म को बनाया गया. यह जमींदारों के अत्याचार और शोषण के विरुद्ध गरीबों की संघर्ष कथा है जो महबूब खान की फिल्म ‘मदर इण्डिया’ के वातावरण की याद दिलाती है. वही ग्रामीण परिवेश, वही चुहल, वही शोषण, वही प्रतिकार, वही अपने सम्मान की रक्षा के लिए संघर्ष. फिल्म में गाँव वालों के परिवार हैं, उनकी झोपड़ियाँ हैं, जमींदार का भव्य मकान है, नर्तकी का कोठा है, स्कूल है, कबड्डी खेलने का मैदान है, कच्ची सड़क है, दूकाने हैं, झील है, नदी है, पहाड़ है; अर्थात् वह सब कुछ ऐसे जतन से जोड़ा गया है जो किसी गाँव को आपके समक्ष जीवंत कर दे.
उस काल में इस विषय पर कई रोचक फिल्में बनी; राजकपूर ने बनायी ‘जिस देश में गंगा बहती है’ (१९६०), दिलीपकुमार ने ‘गंगा जमना’ (१९६१), सुनील दत्त ने ‘मुझे जीने दो’ (१९६३), ये तीनों फ़िल्में दर्शकों में बेहद लोकप्रिय हुई. ‘जिस देश में गंगा बहती है’ और ‘गंगा जमना’ ने तो सिनेमाहाल की टिकट खिड़कियों को हिलाकर रख दिया. ‘जिस देश में गंगा बहती है’ में डाकुओं के आत्मसमर्पण की उहापोह का भावुक चित्रण था तो ‘गंगा जमना’ में अत्याचार के विरोध में डकैत बनने और इंसाफ की डगर में दो भाइयों के मध्य विचारों के संघर्ष का.